प्राइवेट स्कूलों की मनमानी ड्रेस,किताबों के लिए प्राइवेट स्कूल संचालक मनचाहे बुक डिपो और कपडे की दुकानों पर भेज रहे अभिभावकों को..

✒️सुभाष मेश्राम की खबर…..

जगदलपुर /बस्तर

📍सभी किताबें बूकडिपो पर नहीं मिल रही है  मजबूर अभिभावकों को खरीदना पड़ रहा है सारी किताबें प्राइवेट स्कूल से ही अपने बच्चों के लिए, कई बुक डिपो संचालकों का कहना है कि एनसीईआरटी(राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (National Council of Educational Research and Training)  कुछ किताबें( कक्षा छठवीं से आठवीं तक की) इंग्लिश संस्कृत और सामाजिक विज्ञान के अलावा अन्य किताबें उनके पास उपलब्ध नहीं है

🟥कक्षा पहली से लेकर पांचवी तक की किताबें कई प्राइवेट स्कूले खुद बेच रही हैं प्राइवेट स्कूल द्वारा स्वयं से ही किताबों का विक्रय करना एक गंभीर विषय है जिसमें अभिभावकों की मजबूरी का स्कूल  फायदा उठा रहा है 

🟥 प्राइवेट स्कूलों की किताबों का मूल्य हजारों रुपयों में हैं लेकिन नियमों को नजरअंदाज करते हुए स्कूल इनका पक्का बिल (gst बिल ) नहीं दे रही हैं कई स्कूलों में ऑनलाइन (कैश लेश ) पेमेंट लेने से भी मना किया जा रहा हैं

🟥अप्रैल माह में  नई कक्षाओं में विद्यार्थियों के शिक्षा सत्र को शुरू करना अभिभावकों के लिए सरदर्द बन गया है जहां निजी स्कूलों के संचालकों के द्वारा अपने शिक्षकों को विद्यार्थियों पर दबाव डालने के लिए कहा जाता है कि नए सत्र की नई किताबें जल्द से जल्द खरीदें और नए क्लास में नए स्कूल ड्रेस पहन कर ही स्कूल आना है जिससे कई बार आरटीई के तहत पढ़ रहे गरीब परिवार के बच्चों को स्कूल प्रशासन द्वारा परेशान किया जाता है मजबूरन अभिभावक  अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते या फिर मजबूरन कर्ज लेकर महंगी किताबें और स्कूल ड्रेस खरीद कर परेशान होते रहते हैं ऐसे स्कूल जो RTE के तहत पढ़ने वाले बच्चों को नई किताबें और नए स्कूल ड्रेस खरीदने पर मजबूर करते हैं उनके ऊपर सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए क्योंकि RTE के तहत शिक्षा लेने वाले कई परिवारों की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं होती की वह तत्काल में नई किताबें और स्कूल ड्रेस खरीद सके..

🟥विद्या ज्योति,सेंट जेवियर्स,दीप्ति कॉन्वेंट और निर्मल विद्यालय के अभिभावकों का कहना है कि उनके द्वारा जब स्कूल प्रशासन से पुस्तकों की जानकारी मांगी गई तो सारी पुस्तक स्कूल में ही उपलब्ध होने की बात स्कूल प्रबंधन ने कहीं और जब अभिभावकों के द्वारा किताबों के ऑनलाइन पेमेंट के लिए स्कूल प्रशासन को कहा तो स्कूल प्रबंधन के द्वारा टाल मटोल करते हुए जीएसटी बिल देने से मना करने लगे इससे इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि निजी स्कूल संचालकों के द्वारा शिक्षा के नाम पर आम नागरिकों से किताबों का डर दिखाकर मोटी रकम लेकर महंगी किताबें बेची जा रही है

शिक्षा के इस व्यापार को लगाम लगाने के लिए जिला शिक्षा अधिकारी और जिलाधीश कलेक्टर महोदय इस विषय में संज्ञान लेते हुए जल्द ही कोई बड़ी कार्रवाई करनी चाहिए जिससे निजी स्कूलों की मनमानी को रोका जा सके और गरीब परिवार के बच्चों को भी अच्छी शिक्षा मिल पाए

Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *